हिमालय बचाओ आन्दोलन / Save Himalaya Movement

हिमालय बचाओ आन्दोलन / Save Himalaya Movement

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“धार ऐंच पाणी - ढाल पर डाला, बिजली बनावा खाला-खाला " Save Himalaya Movement - an effort made on 2nd. The Group headed by Mr. instead of fruits growing trees.

April, 1992 by a group of people to alarm the Government and the people to the upcoming threats to Himalaya Range. Sunder Lal Bahuguna, world renowned environmentalist & Chipko Leader has a clear analysis on the threats that was arising primarily on the abbreviation of 3 ‘J’s - Jal (Water), Jangal (Forest) & Jameen (Land). Prima Facie to these three ‘J’s today we add fouth ‘J’ as Jawani (Youth

19/01/2026
स्मृति शेष : वरिष्ठ कथाकार विद्यासागर नौटियाल के जन्मदिन पर विशेष 29/09/2025

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स्मृति शेष : वरिष्ठ कथाकार विद्यासागर नौटियाल के जन्मदिन पर विशेष विद्या सागर नौटियाल 29.09.1933 -18.02.2012   By - Dr. Arun Kuksal विद्या सागर नौटियाल की कहानियों में लोक कथात्मकता और राजनीतिक सचेतता का अद....

25/09/2025

इको सेंसिटिव जोन - आज समय की मांग है।
पहाड़ में आपदा जहां एक ओर लोगों को त्रासदी की तरफ फेंकता है वहीं धनापति वर्ग को धन सृजित करने का अवसर देता है।
पहले विकास के नाम पर पर्यावरण विपरीत निर्माण कार्य पूंजीपतियों को दिया जाता है। अनियंत्रित और अनियोजित विकास कार्य आपदा के घनत्व को बढ़ावा देता है। फिर बहुत नुकसान होने के पश्चात पुनर्निर्माण के नाम पर फिर पूंजीपतियों को काम दिया जाता है। इन सारे प्रकरण में जनता इसको प्रकृति की मार समझती है। लेकिन इस सारे के पीछे वर्तमान सरकार एक बहुत बड़ा पार्टी का राजस्व खड़ा कर देती है, जो अगले चुनाव या केंद्र में पार्टी के लिये चन्दा स्वरूप जाता है।
अब यह बात तो तय है कि डिजास्टर मैनेजमेंट का शब्द को अमली जामा पर द्रुत कार्य जरूर होगा लेकिन पोस्ट डिजास्टर मैनेजमेंट को लेकर यानी आपदा के बाद, लेकिन प्री डिजास्टर मैनेजमेंट में कार्य बहुत ही कम होगा। जरूरी प्री डिजास्टर मैनेजमेंट की है।
बहराल आपदा के पीछे मकसद को सभी को समझना होगा।
सन 2012-13 के इको सेंसिटिव ज़ोन के प्रारूप को समझना होगा।
अगर पर्वतीय क्षेत्र में यह लागू तो अनियोजित व अनियंत्रित निर्माण कार्य पर रोक लगेगी। और आपदा से नुकसान कम होगा।

16/09/2025

अपने को बैंकरप्ट घोषित करने वाला, पूरे देश के खजाने को लूट (कर्ज माफी) कर ले जाने वाला अब चला उत्तराखंड की संपदा लूटने।
प्रकृति पर अपना धंधा जमाने अडाणी आया पहाड़ लूटने।

05/09/2025

जब हर व्यक्ति अपने आप को पत्रकार समझे, हर एक व्यक्ति सामाजिक मूल्यों को ताक में रखकर अपने मन से कृत्य को जायज मान समाज मे दुष्प्रचार करे, जब चाटूकारिता के चलते निजी स्वार्थ को सर्वोपरि मान समाज मे अनैतिकता को बढ़ावा दिया जाये, तब स्वतः समाज बंटता हुआ दिखाई देता है।
पिछले कई समय से पत्रकारिकता की अहमियत या पत्रकार शब्द के अंदर छिपे मुद्दों पर परिपक्वता व समझ को जाने बगैर आज अमूमन व्यक्ति बिना माइक व कलम के फेसबुक वॉल पर पोस्ट डाल खबर छाप देता है। यह नही कि कई ऐसी खबरें होती है जो संभवतः अखबार और मीडिया के पहुंच से बाहर हो या कई ऐसी वाक्यात भी होते है जिससे समाज को दिशा व प्रेरणा मिलती है, वहां यह सोशल मीडिया अत्यंत कारागर सिद्ध साबित होता गई। लेकिन प्रतिशत देखें तो ज्यादा नही है। वहीं दूसरी ओर दुष्प्रचार, चाटूकारिकता, और चुनावी दंगल में अपना बर्चस्व के चलते ऐसी बातों को प्राथमिकता दी जाती है जो समाज के हितों से दूर सामाजिक सामरिकता के लिये बहुत बड़ा खतरा हो गया है। धर्म, जाति, संगठन इत्यादि के नाम पर द्वेष, घृणा, आपसी भाईचारा के विपरीत कार्य किया जा रहा है।

Photos from हिमालय बचाओ आन्दोलन / Save Himalaya Movement's post 05/09/2025

हिमालय क्षेत्र में बढ़ती आपदा को लेकर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी अपने आप के सरकारी कार्य पर पशनचिन्ह लगाती नजर आती है।
कुछ दिन पूर्व हम लोगो द्वारा यही बात आपदा पर यथास्थिति आंकलन करने के पश्च्यात कही थी। हिमालय बचाओ आंदोलन के कार्यकर्ता द्वारा यह स्पष्ट किया गया था कि अनियोजित विकास में सरकार के व्यक्तिगत स्वार्थ निहित है, यही कारण है कि भौगोलिक परिस्थिति के विपरीत व पारिस्थितिकी को दरकिनार कर विकास के नाम पर ऐसे कार्य किये जा रहे है जिसमे स्थानीय लोगों कि भागीदारी निम्न है व ठेकेदार, पूंजीपति व कॉर्पोरेट घराने से ताल्लुक रखने वालो कि भागीदारी ज्यादा है।
और जब पैसा कमाने की होड़ हो तो जनता को गुमराह करना सबसे पहला चरण होता है। वनस्पति, जन्तु, पर्यावरण, नदियां, पहाड़ के साथ जीने वाले ग्रामीण भले ही इस सबके संरक्षक हो सकते है लेकिन सरकारी पालिसी के शब्दों से इनका दूर दूर तक कोई नाता नही होता। और यह ग्रामीण अधिकतर सरकारी नीतियों के मायाजाल के पैदावन विनाश के साक्षी बन जाते है।

हम फिर आगाह करना चाहते है :

1. पारिस्थितिकी को विक्षुब्ध किये बगैर विकास कार्य किये जायें
2. रोड का चौड़ीकरण हो लेकिन बिना पहाड़ कटान के, रोड के समानांतर निर्माण कर रोड चौड़ी की जाए
3. पहाड़ में ब्लास्टिंग वर्जित हो
4. धामो में अत्याधिक हवाई यात्रा पर प्रतिबंध लगे।
5. हवाई यात्रा की जगह, रोप वे पर ज्यादा जोर दिया जाये
6. बड़े बांधों की जगह छोटे बांध का निर्माण हो
7. पहाड़ो में मिश्रित वन पर जोर दिया जाये
8. अनियंत्रित व अनियोजित खनन पर रोक लगे।

15/06/2025

धामो की हवाई यात्रा पर लगाम लगाई जाये।

हवाई यात्रा, धामो की पर्यावरणीय क्षति व धामो की महत्व को धूमिल के प्रति अग्रसर है।
धामो में हवाई यात्रा नैसर्गिक पर्यावरणीय वातावरण के विपरीत कार्य है। हवाई यात्रा विषम परिस्थिति- अत्याधिक जरूरतमंद के लिये ही सुविधा हो।
उत्तराखंड में धामो की अपनी अपनी प्रासंगिकता है, केदारनाथ धाम तपस्थली है, इसकी गरिमा और महत्व तप के आधार पर है। बिना तप किये बाबा केदार के वस्तु दर्शन तो हो सकते है लेकिन भक्तमय दर्शन दुश्वर है। जिस ध्येय स यात्रा प्रारंभ की जाती है वह हमेशा अधूरी ही रह जाती है।
वर्तमान में केदारनाथ धाम की यात्रा ज्यादातर धार्मिक यात्रा की जगह पर्यटन के नाम स शुशोभित होता जा रहा है ।
बिना तप के बाबा केदार के आध्यात्मिक दर्शन नही हो सकता, यह सर्वाधि सत्य है।
तपस्थली का वातावरण अपने आप मे भक्तिमय होता है और इस वातावरण में खलल करना तप में खलल डालने समान है।
यही नही पर्यावरणीय दृष्टिकोण से हवाई यात्रा बेहद दुष्परिणाम का पर्याय है। अपनी जर्जर और भीषण गरजा से हेलीकॉप्टर, पर्वतीय पहाड़ो को और कमजोर कर रही है, वहां के जन्तु- जानवर को पारिस्थिकी को संतुलित करने में अपनी अहम भूमिका निभाते है, उनकी स्वछन्दा में अवरोधक बनते है। यही नही ध्वनि प्रदुषण का बहुत बड़ा स्रोत भी यही हेलीकाप्टर है।
प्रदेश सरकार आर्थिकी पर ज्यादा ध्यान केंद्रित न करे बल्किन इससे ज्यादा महत्वपूर्ण पर्यावरणीय व पारिस्थिकी पर ध्यान केंद्रित करें, यह प्रदेश की भौतिक आर्थिकी से ज्यादा महत्वपूर्ण है। सरकार सर्वागीण आर्थिकी पर ध्यान दें।

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