आप मय-ख़ाने को घर अपना बनाए हुए हैं
हम इधर ओखली में सर को लगाए हुए हैं//1
मुस्त'इद रहते हैं तलवार वो हाथों में लिए
और हम करते भी क्या सर को झुकाए हुए हैं//2
कोई मज़लूम की फ़रियाद-रसी हो कैसे
अपने दरबार पे वो ताले सजाए हुए हैं//3
वो हुकूमत का अलम कैसे उठा पाएंगे
पालकी एक सुहानी जो उठाए हुए हैं//4
राख़ कर दे न कहीं अम्न की दुनिया सारी
आहें मज़लूम जो सीने में दबाए हुए हैं//5
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छठवीं फैल
Alto जैसी जिन्दगी
audi जैसे ख्वाब
टेम्पो जैसे दोस्त और
JCB जैसे रिश्तेदार
😁✍️✍️✍️
इंसान की शिनाख्त फ़क़त ख़ानदाँ नहीं
हर फूल का वजूद यहाँ बाग़बाँ नहीं
मतलब निकालने को मिला हाँ में हाँ नहीं
अव्वल मैं जानता हूँ ये तेरी ज़ुबाँ नहीं
अपनी अना के सामने हैरत-ज़दा हूँ मैं
कितना ग़लत हूँ फिर भी ग़लत फ़हमियाँ नहीं
जब रहगुज़र ही खत्म तो मंज़िल क्या करूँ
मेरी उड़ान तक कोई क्या आसमाँ नहीं
सजदा भी क्यों करूँ मैं ख़ुदा तेरे सामने
मुझ पर यहाँ तू इतना कोई मेहरबाँ नहीं
रसिया हैं हम ग़ज़ल के तबीयत समझ ज़रा
ग़ज़लें सुना यहाँ पे कोई दास्ताँ नहीं
अय ज़िंदगी घुटन से कहीं मर न जाएँ हम
दीवार और छत तो है पर खिड़कियाँ नहीं
ا
निकला अना-परस्त भी "" आपका
इसके मुकाबले में कोई नौजवाँ नहीं
कोशिश के बावजूद ये इल्ज़ाम रह गया
हर काम में हमेशा कोई काम रह गया
छोटी थी उम्र और फ़साना तवील था
आगाज़ ही लिखा गया अंजाम रह गया
उठ उठ के मस्जिदों से नमाज़ी चले गए
दहशत-गरों के हाथ में इस्लाम रह गया
उस का कुसूर ये था बहुत सोचता था वो
वो कामयाब हो के भी नाकाम रह गया
अब क्या बताएँ कौन था क्या था वो एक शख़्स
गिनती के चार हॉर्फो का जो नाम रह गया
24/02/2026
हम ने हँस हँस के तेरी बज़्म में ऐ ज़िंदगी
कितनी आहों को छुपाया है, तुझे क्या मालूम ❤️🩹
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2026
जान लेने को ये तैयार हमारी निकले।
शाहज़ादे भी हक़ीक़त में #भिखारी निकले
एक सदी बीत गई इनको तमाशा करते
हमने रहबर जो चुने थे वो #मदारी निकले।।
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