09/04/2025
संविधान के अनुच्छेद 51 (क) के उप धारा (ज) में यह स्पष्ट आदेश दिया गया है कि प्रत्येक नागरिक का यह मौलिक कर्तव्य है कि वह वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानवतावाद तथा अन्वेषण तथा अनुसंधान करने के लिए कृत संकल्प रहे।
पंरतु गत् एक दशक में उपरोक्त संवैधानिक मूल्यों और आदर्शों को तार-तार कर धर्मांधता की आड़ में केवल अंधविश्वास, ढोंग और पाखंड फैलाया जा रहा है। राम नवमी के दिन जब आदरणीय नरेंद्र मोदी जी श्रीलंका से वापस भारत लौट रहे थे, तब उन्होंने सोशल मीडिया पर यह लिखा कि "मैं दिव्य रामसेतु और प्रभु श्री राम का अलौकिक सूर्य तिलक का दर्शन कर अभिभूत हो गया"। "दिव्य" और "अलौकिक" शब्दों से देवत्व की आभा उत्सर्जित होती है जो दैविक दर्शन का समानार्थी है। परंतु अयोध्या के रामलला के ललाट पर सूर्य तिलक दैविक नहीं यांत्रिक प्रबंधन का प्रतिफल था। एक करोड़ 20 लाख रुपए की लागत से अयोध्या मंदिर के तीसरे तल्ले पर Reflector Box लगाया गया था। जिसमें पीतल के पाइप में चार अन्य लेंस लगाए गए थे जिसके द्वारा सूर्य की किरणें परावर्तित होकर मूर्ति के सिर पर 70 mm व्यास का गोला बना रहा था। इसी परावर्तित किरणों के भौतिक प्रकिया को गोदी मीडिया इसे दैविक चमत्कार बताते हुए उसे सीधे प्रसारित कर रहा था और दर्शकों को अंध विश्वास के महासागर में डुबोकर जनमानस को दिग्भ्रमित कर रहा था। भक्तगण जय श्रीराम के उद्घोष कर रहे थे।
उल्लेखनीय है कि कर्नाटक के दलित मूर्तिकार अरुण योगी राज ने अपने अपूर्व कला कौशल से रामलाल की मूर्ति तरासी थी। परंतु राम मंदिर अथवा उनके न्यास परिषद में दलित मूर्तिकार का ना तो कोई चर्चा है और ना हीं उन्हें न्यास परिषद का सदस्य ही मनोनीत किया गया।
स्मरणीय है कि मोदी सरकार ने न्यास परिषद में चार सदस्यों को मनोनीत किया जो सभी ब्राह्मण है उनमें से कुछ भारतीय प्रशासनिक सेवा के कई सेवानिवृत अधिकारी हैं। मोदी जी यदि चाहते तो भारतीय प्रशासनिक सेवा से निवृत दलित, महिला, अन्य पिछड़ा वर्ग और मुसलमान के अधिकारियो को भी न्यास परिषद में मनोनीत कर सबका साथ सबका विकास के अपने नारे को चरितार्थ करते। परंतु भारतीय जनता पार्टी पूर्णतः एक मनुवादी दल है जिसमें बहुजनों के लिए कोई स्थान नहीं है। यह भी एक विचारणीय प्रश्न है कि भाजपाई लोग "जय श्री राम का नारा" क्यों लगाते हैं ? जिसका उत्तर रामचरित मानस के उत्तर कांड की इन चौपाइयों में अंकित है :
“पूर्ण्य एक जग महू नहीं दूजा, मन क्रम बचन विप्र पद पूजा। सुनत सुधामय बचन राम के, हरष गहे पद कृपा निधान के।। “
अर्थात लंका विजय करने के बाद जब भगवान राम अयोध्या लौटे तब अपनी प्रजा को दिव्य ज्ञान देते हुए यह उपदेश दिया कि संसार में मन, क्रम, वचन से ब्राह्मणों के पैर की पूजा करने से बढ़कर कोई दूसरा अन्य पुण्य नहीं है। भगवान के मुख से अमृत तुल्य यह उपदेश सुनकर सभी भक्तों ने इस मूलमंत्र के लिए उनके पैरों में लिपटकर आभार प्रकट किया। स्पष्ट है कि प्रभु की भक्ति, सूख और समृद्धि की प्राप्ति का एकमात्र साधन है ब्राह्मण की चरण वंदना, उनको दक्षिणा और उनकी अर्चना।
प्रसंगवश यहां यह भी उल्लेख करना आवश्यक है कि भगवान श्री राम ने ही तपस्वी शंवुक का इसलिए वध किया था कि शूद्र होकर भी वह वेदोंच्चार कर तपस्या में लीन था। हिंदू ग्रंथों में शूद्रों को तपस्या करने, वेदाध्ययन और पूजा करने का अधिकार नहीं है। इसी वैदिक दर्शन के कारण भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद जी को ब्राह्मणों ने जगन्नाथ पुरी के गर्भ गृह में जाने से 18 मार्च 2011 को जबरन रोक दिया था, जिसपर राष्ट्रपति सचिवालय ने कड़ी आपत्ति दर्ज की थी। देश के तत्कालीन राष्ट्रपति को इतना बड़ा सार्वजनिक अपमान होने पर भी भाजपा सरकार ने जगन्नाथ पुरी के ब्राह्मणों के खिलाफ "अनुसूचित जाति जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम 1989" के अंतर्गत अब तक कोई मुकदमा दर्ज नहीं किया है, और गिरफ्तारी की तो बात ही दूर।
सारांश यह है कि मनुवाद को बढ़ावा देकर भाजपाई लगातार अंधविश्वास को परोस कर बहुजनों को हिंदुत्व के सोम रस में डुबोकर उन्हें मदहोश रखते हैं, और उनके वैधानिक आरक्षण और गरिमामय जीवन जीने के अधिकार से उन्हें वंचित रखने के लिए सदा तत्पर रहते हैं।

06/04/2025