झारखंड के धनबाद में जो हुआ, वो किसी भी सभ्य समाज के लिए शर्मनाक है। सड़क पर इंसानों को बांधकर घुमाना—ये कानून नहीं, ये खुली गुंडागर्दी है।
क्या झारखंड पुलिस अब अदालत बन चुकी है?
किस अधिकार से किसी आरोपी को सज़ा देने का फैसला सड़क पर किया जा रहा है?
अगर यही “न्याय” है, तो फिर संविधान और अदालतों का क्या मतलब बचता है?
हेमंत सोरेन जी, अब चुप्पी नहीं चलेगी
आपको जवाब देना ही होगा: माननीय Hemant Soren जी
क्या यही आपका “सुशासन” है?
जहां कानून की जगह लाठी और अपमान ने ले ली है?
जहां पुलिस वर्दी में इंसाफ नहीं, बल्कि डर दिखा रही है?
याद रखिए—
आज अगर किसी को “आरोपी” बताकर सड़क पर बेइज्जत किया जा सकता है,
तो कल यही सिस्टम किसी भी आम नागरिक के साथ खड़ा हो सकता है।
ये मामला सिर्फ एक समुदाय का नहीं—
ये हर उस भारतीय का है जो संविधान और कानून के राज में विश्वास रखता है।
हम साफ मांग करते हैं:
👉 इस पूरे मामले की निष्पक्ष और न्यायिक जांच हो
👉 जिम्मेदार पुलिसकर्मियों को तुरंत निलंबित किया जाए
👉 जनता के सामने सच्चाई लाई जाए
👉 कानून का राज बहाल किया जाए
लोकतंत्र में इंसाफ अदालत में होता है, सड़क पर नहीं।
अगर आज भी आवाज़ नहीं उठी, तो कल बोलने का हक भी छिन जाएगा।
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